Saturday, December 29, 2007

तीरे नजर के सामने

मर गया इन्साफ फिर कल न्याय घर के सामने।
कौन रुकता है भला ऐसी खबर के सामने॥
पूंछता है रास्ता खुद हमसे अपना रास्ता,
कैसे मंजर आ गये हैं, अब सफर के सामने।
जान ले लेती उसी को देखकर जीते हैं हम,
उसका खंजर रख लिया हमने जिगर के सामने।
पानी-पानी आग हो जाती है जिसको देखकर,
कौन ठहरेगा तेरे तीरे नजर के सामने।

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राजा रजवाड़े बिके किले हो गए चूर।
युग-युग से बेदाम है चुटकी भर सिन्दूर।
बिक जायेंगी कोठियां सिंहासन नीलाम।
राजा तुम मत पूछना इस नथुनी का दाम।
डाक्टर वैद्य हकीम घर मिटी न मन की पीर।
दर्द दवाई बन गया जबसे मिले कबीर।
सात पलों में हो गया सात जन्म का प्यार।
अब तक काटी सब उमर आज लगा बेकार।
सुबह-सुबह बिखरा दिखे माथे पर सिन्दूर।
जैसे जलकर लौ बने शीतल श्वेत कपूर।
जादू चितवन कर गई मारि गयो है काठ।
मन में अगर उमंग हो क्या सोलह क्या साथ।।

दोहे

बजे फूँक से बांसुरी कैसो अजब कमाल।
ताता थइया नाचते जिस पर नटवरलाल॥

काबा, काशी, कामरू क्यों जायें गिरिनार।
आँचल में जिसने सहज बाँध लिया हो प्यार॥

फेरे सात लगा लिये जबसे मन से मीत।
सा रे गा मा पा धा नी, उम्र हुई संगीत॥

सात पलों में हो गया सात जन्म का प्यार।
अब तक काटी सब उमर आज लगा बेकार॥

जबसे उनके हो गये तबसे शहंशाह।
जाने कितनी बढ़ गयी अब जीने की चाह॥

मन वृन्दावन हो गया तन यमुना का कूल।
मेरे आँगन में बसे आकर नवीं रसूल॥

मन्दिर मस्जिद चर्च में ढूंढा उमर तमाम।
वो दिल की दहलीज़ में रहा सुबह से शाम॥