Saturday, January 12, 2008

नारी

परियों के पर ले के उड़ती फुदकती है,
कन्याकुमारी का किनारा लगने लगी।
सोलह श्रंगार तन, मन में अंगार साज,
निकलती तो जादुई नजारा लगने लगी।
आंचल में ढांकती कन्हाई को जुहाई देख,
मोरी मैया जैसे ध्रुवतारा लगने लगी।
लकुटी ले सत्यनाम जपने लगी तो,
नख-शिख तक देह गुरुद्वारा लगने लगी।
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आँख से उठा ले जिसे मोती बन जाता वह,
आँख से गिरा दे तो कबाड़ा बन जाता है,
मीरा के मंजीरों पे समूची सृष्टि नाचती है,
हंस दे तो प्रेम रंग गाढ़ा बन जाता है।
इन्दिरा बने तो सारा विश्व माँगता है पानी,
माया बने देश ही अखाड़ा बन जाता है।
कातर हो द्रौपदी से अश्रु जो गिरा दे कहीं,
वख्त युद्धभूमि का नगाड़ा बन जाता है।
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राधे का स्वरूप श्याम जिसके बिना है आधे,
लाल यशुदा के सोलहो कला प्रवीन है।
देवकी बने तो जेल खुद ही कपाट खोले,
ललिता बने तो सारी गलियां हसीन है।
रत्ना बने तो सारे विश्व को रत्न बांटे,
सेवरी सी भक्ति राम जिसके अधीन है।
नारी की किताब सबसे बड़ा खिताब,
विधि हू न बांच पाये, हर्फ़ इतने महीन है।

प्यार युद्ध की तरह...

प्यार के स्वरों को छेड़ा जाये जो सलीके से तो,
देह हर उम्र में सितार बन जाती है।
जब भी किया गया है रूप का अनादर तो,
काजल की कोर भी कतार बन जाती है।
आग को उगलती दुपहरी में कोई मीत,
साथ हो तो सावनी फुहार बन जाती है।
वासना, उपासना के द्वार खोलने लगे तो,
प्रणय की बात भी विचार बन जाती है।
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चूर-चूर आइने को तुमने किया परन्तु,
टुकड़ों से चित्र को हटा के ज़रा देखिये।
प्यार परछाई उम्र ढलने के साथ बढ़े,
याद की लकीर को घटा के ज़रा देखिये।
माटी के घरौंदे पल में मिटा दिये परन्तु,
दिल के खिलौनों को मिटा के जरा देखिये।
शक्ति वाली लाठी पर इतना भरोसा है तो,
पानी वाली धार को बाँट के ज़रा देखिये।
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प्यार युद्ध की तरह शुरू करना सरल,
किन्तु अंत करना बड़ा कठिन काम है।
नास्तिक हो भले या कोई हो बड़ा नवाब,
किन्तु हर देह किसी देह की गुलाम है।
कल एक घोड़े ने सवार से कहा सुनो जी,
तेरी सांस की भी किसी हाथ में लगाम है।
कर्मयोग के साथ जो भावना पवित्र हो तो,
गाई का भी राम है, कसाई का भी राम है।

मन की अंगूठी में तुम्हारे नाम का नगीना

एक-एक अक्षर से बांसुरी के बोल झरे,
विधि ने लिखा है नाम कौन सी कलम से,
रूप है कि खुशबू में चाँदनी नहा के आई,
पानी-पानी रति हुई देख के शर्म से।
मन्दिर झुका के खुद शीश कहने लगा था,
पूरी हुई साध जो थी कितने जन्म से।
बीच सिन्धु की भी थाह लेते जो पलों में,
वे भी, आँख में तुम्हारी डूब जाते हैं कसम से।
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मन की अंगूठी में तुम्हारे नाम का नगीना,
जबसे जड़ा है, देह कचनार हो गयी।
पोर-पोर सारे तार बिखरे हुए थे किन्तु,
आपने छुवा कि जिन्दगी सितार हो गयी।
संयम की नाव डूबती थी वख्त की नदी में,
एक उंगली तुम्हारी पतवार हो गयी।
सांस-सांस लाजवाब उम्र हो गई गुलाब
जबसे जनाब ये निगाहें चार हो गयी॥

पानी में भी आग को लगाने वाले दिन थे

माँग का सिन्दूर रात गाल पे बिखरता था,
जागने पे बाहर लजाने वाले दिन थे।
डाल के उँगलियों पे जुल्फों के तार-तार,
देह के सितार को बजाने वाले दिन थे।
पूरी रात होंठ प्रेम सरिता में डूबते थे,
पल-पल प्यास को बढ़ाने वाले दिन थे।
पानी-पानी आग को बनाने में प्रवीण और
पानी में भी आग को लगाने वाले दिन थे।
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मेहंदी रचाये हाथ बार-बार चूमते थे
आँगन में चन्द्रमा उतारने के दिन थे।
नाक की नथुनिया उलझती थी कपडों से
बार-बार उसको सुधारने के दिन थे।
रसराज ऋतुराज दिल में समा गए थे,
आँख बन्द करके निहारने के दिन थे।
सारी-सारी रात होंठ से पलाश झरता था,
बार-बार जीभ से बुहारने के दिन थे।
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नख-शिख तक पूरी देह में मचा था रास,
राधे-राधे, श्याम-श्याम बोलने के दिन थे।
कजरारी पलकों में इन्द्रजाल की किताब,
प्यार के खिताब को टटोलने के दिन थे।
सारा ज्ञान, मान, अभिमान हो गया था चूर।
भक्ति अनुरक्ति द्वार खोलने के दिन थे।
अंग-अंग फूली कचनार की बहार देख,
धीरज के संयम के डोलने के दिन थे।

Friday, January 11, 2008

आँखें

बोलियेगा सिरहाने अहिस्ता, अभी-अभी सोई हैं मीर की आँखें।
प्रेम के पंथ नजीर बनी, पद्मावती के उस कीर की आँखें।
श्याम सखा से लगेंगे तुम्हे, पढ़ना कभी सूर फकीर की आँखें।
सृष्टि को ज्ञान पसंगा लगा, जब बैठी तुला पे कबीर की आँखें।
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हाड़ा की रानी के राजा का पानी चढा डरी काल की आँखें।
कांपने विश्व समूचा लगा, रहीं इन्दिरा जी की कमाल की आँखें।
गोविन्द सिंह के शेरों की गाथा को आज भी गाती दीवाल की आँखें।
'बन्दा' सा बन्दा हुआ ही नही मरने पर बोली मिशाल थी आँखें।
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कांपने सिन्धु लगा पल में, रखी राम ने जैसे कमान पे आँखें।
रावण इंच न आगे बढ़ा, रखी गिद्ध ने ज्योंही विमान पे आँखें।
गौरी का चूर गुमान हुआ राखी "अंगुल अष्ट प्रमान" पे आँखें।
पन्ना को पा महीं धन्य हुई, रख दी सुत के बलिदान पे आँखें।
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अंतर्दृष्टि से देखना प्यार से बोलती हैं मुमताज़ की आँखें।
प्यास को प्राणों में पैदा करो रस घोलती है मुमताज़ की आँखें।
हौले से गीत गोविन्द की पुस्तक खोलती है मुमताज़ की आँखें।
चांदनी रात में डूब के देखना डोलती है मुमताज़ की आँखें।

क्या करूँ मैं?

चाँदनी ओस में डूबी हुई, करती है इशारे तो क्या करूँ मैं?
लहरें किसी नायिका जैसी नदी की, जो पूछे किनारा तो क्या करूँ मैं?
आँगन आके बसन्ती बयार, हमारा बुहारे तो क्या करूँ मैं?
फागुनी रात में पायल गाके मल्हार पुकारे तो क्या करूँ मैं?
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रात में फागुन गाये पड़ोसिन संयम टूटे तो दोष नहीं है।
इठलाती दुपट्टा उड़ाती चले, उसे योगी भी लूटे तो दोष नहीं है।
चुटकी बजा आँख नचाये कुएं पर, गागर फूटे तो दोष नहीं है।
प्यार से कोई पुकार ले प्राण को, देह भी छूटे तो दोष नहीं है।
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शीश पे मोर चकोर हो होंठ पे देख के बादल होना पड़ेगा।
नेह निमन्त्रण आँख से तुने दिया है तो काजल होना पड़ेगा।
दे गयी है पुरवा किसी का ख़त बांच के घायल होना पड़ेगा।
काट चिकोटी गया कोई गाल पे, रात में घायल होना पड़ेगा।
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चन्दन की मठिया जैसी देह पे, प्रीति की ज्योति जलाई गयी है।
आँख के क्षीर सरोवर में, कैसे विष्णु की सेज सजाई गयी है।
बूझ के जो अनबूझ रहे, जाने कैसी पहेली बनायीं गयी है।
आग में पानी की रानी खड़ी, या कि पानी में आग लगायी गयी है।

Wednesday, January 9, 2008

होली

ठाढ़ी अटारी पे देखि के मेरे को नैन सों नैन मिला गया गोरी।
श्याम ने बांह मरोरी जो आ सकुचा तन से लिपटा गयी गोरी।
बेसुध हवै के खड़े ही रहे मुख पे जाने क्या-क्या लगा गयी गोरी।
जापे न कोई भी रंग चढ़ै वापे प्रीति को रंग चढ़ा गई गोरी।
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वैसेहु अंग अनंग मरोरत नैन कमान में बान धरौ ना।
भीजि गयो मन अतंरलौ अब या पिचकारी में रंग भरौ ना।
भैया विदेश से आये न होरी में सूने मे जू कोई चाल चलौ ना।
गोरी कलाई मरोरि लौ लेकिन देवर या मुख कारो करौ ना।
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रंग में बोरि दयो तन को अस पीर उठैगी तो कौन हरैगो।
सुधि खो गयी है तन की सिगरी अब देह बिगारि कै काह मिलैगो।
फेकहु बावरी या पिचकारी को नेको नहीं अब धीर धरैगो।
साँवरे रंग में बुड़ि गई अब और नहीं दूजो रंग चढैगो।
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शूल की सेज पे सोई जो प्रेम से गन्ध सनी हुई पांखुरी ह्वै गई।
घोलि गई मिसिरी असि बैनन पूरी धरा ब्रज माधुरी ह्वै गई।
नैनन मोहन मोह नही कछु, त्याग की भक्ति की आंजुरी ह्वै गई।
बावरी स्रष्टि समूची हुई जब कान्ह के होठ पे बांसुरी ह्वै गई।