जागने पे बाहर लजाने वाले दिन थे।
डाल के उँगलियों पे जुल्फों के तार-तार,
देह के सितार को बजाने वाले दिन थे।
पूरी रात होंठ प्रेम सरिता में डूबते थे,
पल-पल प्यास को बढ़ाने वाले दिन थे।
पानी-पानी आग को बनाने में प्रवीण और
पानी में भी आग को लगाने वाले दिन थे।
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मेहंदी रचाये हाथ बार-बार चूमते थे
आँगन में चन्द्रमा उतारने के दिन थे।
नाक की नथुनिया उलझती थी कपडों से
बार-बार उसको सुधारने के दिन थे।
रसराज ऋतुराज दिल में समा गए थे,
आँख बन्द करके निहारने के दिन थे।
सारी-सारी रात होंठ से पलाश झरता था,
बार-बार जीभ से बुहारने के दिन थे।
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नख-शिख तक पूरी देह में मचा था रास,
राधे-राधे, श्याम-श्याम बोलने के दिन थे।
कजरारी पलकों में इन्द्रजाल की किताब,
प्यार के खिताब को टटोलने के दिन थे।
सारा ज्ञान, मान, अभिमान हो गया था चूर।
भक्ति अनुरक्ति द्वार खोलने के दिन थे।
अंग-अंग फूली कचनार की बहार देख,
धीरज के संयम के डोलने के दिन थे।
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