Wednesday, January 9, 2008

होली

ठाढ़ी अटारी पे देखि के मेरे को नैन सों नैन मिला गया गोरी।
श्याम ने बांह मरोरी जो आ सकुचा तन से लिपटा गयी गोरी।
बेसुध हवै के खड़े ही रहे मुख पे जाने क्या-क्या लगा गयी गोरी।
जापे न कोई भी रंग चढ़ै वापे प्रीति को रंग चढ़ा गई गोरी।
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वैसेहु अंग अनंग मरोरत नैन कमान में बान धरौ ना।
भीजि गयो मन अतंरलौ अब या पिचकारी में रंग भरौ ना।
भैया विदेश से आये न होरी में सूने मे जू कोई चाल चलौ ना।
गोरी कलाई मरोरि लौ लेकिन देवर या मुख कारो करौ ना।
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रंग में बोरि दयो तन को अस पीर उठैगी तो कौन हरैगो।
सुधि खो गयी है तन की सिगरी अब देह बिगारि कै काह मिलैगो।
फेकहु बावरी या पिचकारी को नेको नहीं अब धीर धरैगो।
साँवरे रंग में बुड़ि गई अब और नहीं दूजो रंग चढैगो।
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शूल की सेज पे सोई जो प्रेम से गन्ध सनी हुई पांखुरी ह्वै गई।
घोलि गई मिसिरी असि बैनन पूरी धरा ब्रज माधुरी ह्वै गई।
नैनन मोहन मोह नही कछु, त्याग की भक्ति की आंजुरी ह्वै गई।
बावरी स्रष्टि समूची हुई जब कान्ह के होठ पे बांसुरी ह्वै गई।

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