Friday, January 11, 2008

क्या करूँ मैं?

चाँदनी ओस में डूबी हुई, करती है इशारे तो क्या करूँ मैं?
लहरें किसी नायिका जैसी नदी की, जो पूछे किनारा तो क्या करूँ मैं?
आँगन आके बसन्ती बयार, हमारा बुहारे तो क्या करूँ मैं?
फागुनी रात में पायल गाके मल्हार पुकारे तो क्या करूँ मैं?
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रात में फागुन गाये पड़ोसिन संयम टूटे तो दोष नहीं है।
इठलाती दुपट्टा उड़ाती चले, उसे योगी भी लूटे तो दोष नहीं है।
चुटकी बजा आँख नचाये कुएं पर, गागर फूटे तो दोष नहीं है।
प्यार से कोई पुकार ले प्राण को, देह भी छूटे तो दोष नहीं है।
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शीश पे मोर चकोर हो होंठ पे देख के बादल होना पड़ेगा।
नेह निमन्त्रण आँख से तुने दिया है तो काजल होना पड़ेगा।
दे गयी है पुरवा किसी का ख़त बांच के घायल होना पड़ेगा।
काट चिकोटी गया कोई गाल पे, रात में घायल होना पड़ेगा।
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चन्दन की मठिया जैसी देह पे, प्रीति की ज्योति जलाई गयी है।
आँख के क्षीर सरोवर में, कैसे विष्णु की सेज सजाई गयी है।
बूझ के जो अनबूझ रहे, जाने कैसी पहेली बनायीं गयी है।
आग में पानी की रानी खड़ी, या कि पानी में आग लगायी गयी है।

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