Saturday, January 12, 2008

मन की अंगूठी में तुम्हारे नाम का नगीना

एक-एक अक्षर से बांसुरी के बोल झरे,
विधि ने लिखा है नाम कौन सी कलम से,
रूप है कि खुशबू में चाँदनी नहा के आई,
पानी-पानी रति हुई देख के शर्म से।
मन्दिर झुका के खुद शीश कहने लगा था,
पूरी हुई साध जो थी कितने जन्म से।
बीच सिन्धु की भी थाह लेते जो पलों में,
वे भी, आँख में तुम्हारी डूब जाते हैं कसम से।
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मन की अंगूठी में तुम्हारे नाम का नगीना,
जबसे जड़ा है, देह कचनार हो गयी।
पोर-पोर सारे तार बिखरे हुए थे किन्तु,
आपने छुवा कि जिन्दगी सितार हो गयी।
संयम की नाव डूबती थी वख्त की नदी में,
एक उंगली तुम्हारी पतवार हो गयी।
सांस-सांस लाजवाब उम्र हो गई गुलाब
जबसे जनाब ये निगाहें चार हो गयी॥

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