Friday, January 11, 2008

आँखें

बोलियेगा सिरहाने अहिस्ता, अभी-अभी सोई हैं मीर की आँखें।
प्रेम के पंथ नजीर बनी, पद्मावती के उस कीर की आँखें।
श्याम सखा से लगेंगे तुम्हे, पढ़ना कभी सूर फकीर की आँखें।
सृष्टि को ज्ञान पसंगा लगा, जब बैठी तुला पे कबीर की आँखें।
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हाड़ा की रानी के राजा का पानी चढा डरी काल की आँखें।
कांपने विश्व समूचा लगा, रहीं इन्दिरा जी की कमाल की आँखें।
गोविन्द सिंह के शेरों की गाथा को आज भी गाती दीवाल की आँखें।
'बन्दा' सा बन्दा हुआ ही नही मरने पर बोली मिशाल थी आँखें।
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कांपने सिन्धु लगा पल में, रखी राम ने जैसे कमान पे आँखें।
रावण इंच न आगे बढ़ा, रखी गिद्ध ने ज्योंही विमान पे आँखें।
गौरी का चूर गुमान हुआ राखी "अंगुल अष्ट प्रमान" पे आँखें।
पन्ना को पा महीं धन्य हुई, रख दी सुत के बलिदान पे आँखें।
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अंतर्दृष्टि से देखना प्यार से बोलती हैं मुमताज़ की आँखें।
प्यास को प्राणों में पैदा करो रस घोलती है मुमताज़ की आँखें।
हौले से गीत गोविन्द की पुस्तक खोलती है मुमताज़ की आँखें।
चांदनी रात में डूब के देखना डोलती है मुमताज़ की आँखें।

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