कन्याकुमारी का किनारा लगने लगी।
सोलह श्रंगार तन, मन में अंगार साज,
निकलती तो जादुई नजारा लगने लगी।
आंचल में ढांकती कन्हाई को जुहाई देख,
मोरी मैया जैसे ध्रुवतारा लगने लगी।
लकुटी ले सत्यनाम जपने लगी तो,
नख-शिख तक देह गुरुद्वारा लगने लगी।
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आँख से उठा ले जिसे मोती बन जाता वह,आँख से गिरा दे तो कबाड़ा बन जाता है,
मीरा के मंजीरों पे समूची सृष्टि नाचती है,
हंस दे तो प्रेम रंग गाढ़ा बन जाता है।
इन्दिरा बने तो सारा विश्व माँगता है पानी,
माया बने देश ही अखाड़ा बन जाता है।
कातर हो द्रौपदी से अश्रु जो गिरा दे कहीं,
वख्त युद्धभूमि का नगाड़ा बन जाता है।
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राधे का स्वरूप श्याम जिसके बिना है आधे,लाल यशुदा के सोलहो कला प्रवीन है।
देवकी बने तो जेल खुद ही कपाट खोले,
ललिता बने तो सारी गलियां हसीन है।
रत्ना बने तो सारे विश्व को रत्न बांटे,
सेवरी सी भक्ति राम जिसके अधीन है।
नारी की किताब सबसे बड़ा खिताब,
विधि हू न बांच पाये, हर्फ़ इतने महीन है।
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