Saturday, January 12, 2008

प्यार युद्ध की तरह...

प्यार के स्वरों को छेड़ा जाये जो सलीके से तो,
देह हर उम्र में सितार बन जाती है।
जब भी किया गया है रूप का अनादर तो,
काजल की कोर भी कतार बन जाती है।
आग को उगलती दुपहरी में कोई मीत,
साथ हो तो सावनी फुहार बन जाती है।
वासना, उपासना के द्वार खोलने लगे तो,
प्रणय की बात भी विचार बन जाती है।
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चूर-चूर आइने को तुमने किया परन्तु,
टुकड़ों से चित्र को हटा के ज़रा देखिये।
प्यार परछाई उम्र ढलने के साथ बढ़े,
याद की लकीर को घटा के ज़रा देखिये।
माटी के घरौंदे पल में मिटा दिये परन्तु,
दिल के खिलौनों को मिटा के जरा देखिये।
शक्ति वाली लाठी पर इतना भरोसा है तो,
पानी वाली धार को बाँट के ज़रा देखिये।
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प्यार युद्ध की तरह शुरू करना सरल,
किन्तु अंत करना बड़ा कठिन काम है।
नास्तिक हो भले या कोई हो बड़ा नवाब,
किन्तु हर देह किसी देह की गुलाम है।
कल एक घोड़े ने सवार से कहा सुनो जी,
तेरी सांस की भी किसी हाथ में लगाम है।
कर्मयोग के साथ जो भावना पवित्र हो तो,
गाई का भी राम है, कसाई का भी राम है।

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