बजे फूँक से बांसुरी कैसो अजब कमाल।
ताता थइया नाचते जिस पर नटवरलाल॥
काबा, काशी, कामरू क्यों जायें गिरिनार।
आँचल में जिसने सहज बाँध लिया हो प्यार॥
फेरे सात लगा लिये जबसे मन से मीत।
सा रे गा मा पा धा नी, उम्र हुई संगीत॥
सात पलों में हो गया सात जन्म का प्यार।
अब तक काटी सब उमर आज लगा बेकार॥
जबसे उनके हो गये तबसे शहंशाह।
जाने कितनी बढ़ गयी अब जीने की चाह॥
मन वृन्दावन हो गया तन यमुना का कूल।
मेरे आँगन में बसे आकर नवीं रसूल॥
मन्दिर मस्जिद चर्च में ढूंढा उमर तमाम।
वो दिल की दहलीज़ में रहा सुबह से शाम॥
Saturday, December 29, 2007
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment